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Mythology Facts In Hindi: हे केशव मेरे 100 पुत्र मारे गए और मैं अंधा क्यों हुआ — धृतराष्ट्र का पूर्व जन्म का पाप

Mythology Facts In Hindi — दोस्तों, महाभारत की कहानी सिर्फ एक युद्ध की कहानी नहीं है बल्कि यह कर्म और पुनर्जन्म की कहानी है। जो बीज हम बोते हैं वही फल हमें मिलता है, चाहे इस जन्म में मिले या अगले जन्म में। आज हम आपको धृतराष्ट्र की एक ऐसी कहानी बताने जा रहे हैं जो बहुत कम लोग जानते हैं। जब कौरवों का नाश हो गया और सौ पुत्र मारे गए तब धृतराष्ट्र ने भगवान श्रीकृष्ण से सवाल किया कि हे केशव मेरे सौ पुत्र क्यों मारे गए और मैं अंधा क्यों हुआ? तब भगवान ने उन्हें उनके पूर्व जन्म की कहानी सुनाई। आइए जानते हैं वो पूरी कहानी।

युद्ध के बाद धृतराष्ट्र का दुख

महाभारत का भयंकर युद्ध खत्म हो चुका था। कुरुक्षेत्र की धरती लाशों से पट गई थी। धृतराष्ट्र के सौ बेटे एक-एक करके मारे गए। दुर्योधन से लेकर दुःशासन तक सब खत्म हो गए। अंधे राजा धृतराष्ट्र का दिल टूट गया था। वो रो रहे थे, चीख रहे थे। उनका पूरा परिवार उजड़ गया था। गांधारी भी अपने बेटों की मौत पर रो रही थीं। पूरे महल में सिर्फ मातम था। धृतराष्ट्र को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि आखिर ऐसा क्यों हुआ। वो खुद को एक धर्मात्मा राजा मानते थे। उन्होंने कभी किसी का बुरा नहीं चाहा था। दान-पुण्य भी करते रहे थे। फिर उनके साथ इतना बड़ा अन्याय क्यों हुआ?

भगवान कृष्ण के सामने धृतराष्ट्र का सवाल

एक दिन धृतराष्ट्र ने भगवान श्रीकृष्ण को बुलाया। उनकी आवाज में दर्द था, गुस्सा था और सवाल थे। उन्होंने कहा — हे केशव, मैं आपसे पूछना चाहता हूं कि मैंने ऐसा कौन सा पाप किया था कि मेरे सौ पुत्र मारे गए? मैं अंधा क्यों पैदा हुआ? मैंने तो हमेशा धर्म का पालन किया। ब्राह्मणों को दान दिया। प्रजा की सेवा की। फिर मुझे यह सजा क्यों मिली? क्या मैं इस दुख का हकदार था? भगवान कृष्ण मुस्कुराए और बोले — राजन, आपको अपने इस जन्म के कर्मों का नहीं बल्कि पिछले जन्म के कर्मों का फल मिला है। आइए मैं आपको आपके पूर्व जन्म की कहानी सुनाता हूं।

पूर्व जन्म में धृतराष्ट्र एक शिकारी थे

भगवान कृष्ण ने कहानी शुरू की — धृतराष्ट्र, आप पिछले जन्म में एक शिकारी थे। आप जंगल में जानवरों का शिकार करके अपना जीवन चलाते थे। एक दिन आप जंगल में शिकार की तलाश में घूम रहे थे। तभी आपने एक पेड़ पर एक बड़ा सा घोंसला देखा। उस घोंसले में एक माँ चिड़िया अपने सौ छोटे-छोटे बच्चों के साथ बैठी थी। वो अपने बच्चों को खाना खिला रही थी, उनकी देखभाल कर रही थी। वो मासूम बच्चे चहक रहे थे। लेकिन आपके मन में एक बुरा विचार आया। आपने सोचा कि क्यों न इन सभी चिड़ियों को एक साथ मार दिया जाए। बस आपने अपना तीर निकाला और एक-एक करके उन सभी सौ मासूम बच्चों को मार डाला। माँ चिड़िया अपने बच्चों को बचाने की कोशिश कर रही थी लेकिन आपने उसे भी नहीं छोड़ा। आपने माँ चिड़िया को भी मार दिया। वो बेचारी अपने बच्चों की लाशों के बीच तड़पती रही और मर गई।

माँ चिड़िया का श्राप और दुख

भगवान कृष्ण ने आगे कहा — जब वो माँ चिड़िया मर रही थी तो उसने अपनी आखिरी सांसों में आपको श्राप दिया। उसने कहा — हे निर्दयी शिकारी, तूने मेरे सौ मासूम बच्चों को मार डाला। मैं तुझे श्राप देती हूं कि अगले जन्म में तेरे भी सौ बच्चे होंगे और वो सब तेरी आंखों के सामने मारे जाएंगे। और तू उन्हें देख भी नहीं पाएगा क्योंकि तू अंधा होगा। तू वही दर्द महसूस करेगा जो आज मैंने महसूस किया है। उस माँ चिड़िया का यह श्राप बहुत शक्तिशाली था क्योंकि वो एक मासूम माँ का श्राप था जिसके बच्चे बेवजह मारे गए थे। और इसी श्राप की वजह से आप इस जन्म में अंधे पैदा हुए और आपके सौ बेटे युद्ध में मारे गए।

धृतराष्ट्र का एहसास और पछतावा

यह कहानी सुनकर धृतराष्ट्र स्तब्ध रह गए। उन्हें अपने पूर्व जन्म की कोई याद नहीं थी लेकिन भगवान कृष्ण की बात झूठ नहीं हो सकती थी। उन्हें समझ आ गया कि उन्हें अपने ही कर्मों का फल मिला है। जो दर्द उन्होंने उस माँ चिड़िया को दिया था वही दर्द आज उन्हें मिल रहा था। धृतराष्ट्र की आंखों से आंसू बहने लगे। उन्होंने कहा — हे केशव, मैं समझ गया। यह मेरे ही कर्मों का फल है। मैंने निर्दोष प्राणियों को मारा था और आज उसी का हिसाब चुका रहा हूं। लेकिन मुझे अफसोस है कि मेरी गलतियों की सजा मेरे बेटों को मिली। भगवान कृष्ण ने कहा — नहीं राजन, आपके बेटों को सिर्फ आपकी गलतियों की सजा नहीं मिली। उन्हें अपने कर्मों का भी फल मिला। दुर्योधन ने पांडवों के साथ जो अन्याय किया, द्रौपदी का अपमान किया, वो सब उनके अपने पाप थे।

कर्म का सिद्धांत कभी गलत नहीं होता

भगवान कृष्ण ने समझाया — धृतराष्ट्र, यह संसार कर्म के सिद्धांत पर चलता है। जो जैसा करता है वैसा भरता है। आपने सिर्फ एक दिन की क्रूरता में सौ मासूम जीवों को खत्म कर दिया था। आपको उसका हिसाब देना ही था। लेकिन इसमें एक सीख भी है। हर इंसान को अपने कर्मों के बारे में सोचना चाहिए। आज जो भी गलत काम हम करते हैं उसका फल हमें जरूर मिलता है। हो सकता है इसी जन्म में मिले या अगले जन्म में, लेकिन मिलता जरूर है। इसलिए हमें हमेशा अच्छे कर्म करने चाहिए, किसी निर्दोष को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहिए और दूसरों के दुख को समझना चाहिए।

धृतराष्ट्र की दूसरी गलती — अंधा प्यार

लेकिन भगवान कृष्ण ने यह भी कहा — राजन, आपकी एक और बड़ी गलती थी। आप अपने बेटों से अंधा प्यार करते थे। आपको पता था कि दुर्योधन गलत रास्ते पर जा रहा है। विदुर ने आपको कई बार समझाया, संजय ने समझाया, लेकिन आपने कभी अपने बेटों को नहीं रोका। आपने हमेशा उनका साथ दिया चाहे वो गलत ही क्यों न हों। यह आपकी सबसे बड़ी भूल थी। अगर आपने समय रहते अपने बेटों को सही रास्ता दिखाया होता तो शायद यह युद्ध नहीं होता। आपका यह अंधा प्यार ही आपके परिवार के विनाश का कारण बना।

कहानी से मिलने वाली सीख

इस कहानी से हमें बहुत बड़ी सीख मिलती है। पहली सीख यह है कि हमें कभी भी किसी निर्दोष जीव को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहिए। चाहे वो इंसान हो या जानवर या पक्षी, हर जीव को जीने का हक है। दूसरी सीख यह है कि हमारे कर्मों का हिसाब जरूर होता है। आज नहीं तो कल, इस जन्म में नहीं तो अगले जन्म में, लेकिन हर कर्म का फल मिलता है। तीसरी सीख यह है कि अंधा प्यार गलत होता है। अपने बच्चों से प्यार करो लेकिन उनकी गलतियों को नजरअंदाज मत करो। समय रहते उन्हें सही रास्ता दिखाओ वरना बाद में सिर्फ पछताना पड़ेगा।

Disclaimer: यह कहानी पौराणिक कथाओं और महाभारत की विभिन्न व्याख्याओं पर आधारित है। इसमें दी गई घटनाएं धार्मिक ग्रंथों और लोक परंपराओं से ली गई हैं। यह किसी वैज्ञानिक तथ्य या ऐतिहासिक प्रमाण पर आधारित नहीं है। इसे सिर्फ आस्था, विश्वास और नैतिक शिक्षा के उद्देश्य से पढ़ें। इस कहानी का उद्देश्य किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं बल्कि जीवन की सीख देना है।

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